Thursday, August 9, 2012

कल मैने उसकी एक झलक देखी

कल मैने उसकी एक झलक देखी,
बीच राहो मे कही कुछ गुनगुना रही थी,
देख रहा था मैं उसको इधर उधर,
मगर वो लूका छिपी खेल मुस्कुरा रही थी,

आख़िर मिल ही गयी कुछ अरसे बाद,
देखा तो बाह फैलाए बुला रही थी,
हम दोनो थे खफा खफा एक दूसरे से अबतक,
कुछ मैं बता रहा था, कुछ वो बता रही थी,

सुलझा कर सब धागो को,
मिला मेरे दिल को क़रार,
मैं सवर रहा था उसकी आँखों मे,
और वो थपकी दे सुला रही थी,

जब पूछा मैने उससें,
तूने मुझे ये दर्द क्यू दिया,
वो मुस्कुराइ और बोली,
मैं ज़िंदगी हू, जीना सीखा रही थी

2 comments:

  1. मैं ज़िंदगी हू, जीना सीखा रही थी :) Kya baat hai mere sher :) loved it

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